आयुर्वेद के अनुसार जल से सम्पूर्ण शरीर को धोना यानी स्नान अग्निदीपक,शारीर कि पुष्टि करनेवाला और आयु बढानेवाला होता है | स्नान यदि सही तरीके से किया जाए तो ये हमारे शरीर के कान्ति और बल को बढ़ता है |
स्नान से हमारे शरीर के कंडू व मल, बदबू , आलस्य , थकान , प्यास , जलन और अशुद्ध विचार दूर होते हैं जिससे मन को शांति और तन को हल्कापन महसूस होता है |
आयुर्वेद के प्रणेता महर्षि चरक व सुश्रुत के अनुसार -
स्नान से हमारे शरीर के कंडू व मल, बदबू , आलस्य , थकान , प्यास , जलन और अशुद्ध विचार दूर होते हैं जिससे मन को शांति और तन को हल्कापन महसूस होता है |
आयुर्वेद के प्रणेता महर्षि चरक व सुश्रुत के अनुसार -
- गर्दन के नीचे के भाग पर हल्के गर्म जल से स्नान करना चाहिए | ऐसा करने से शारीर में बल आता है | जबकि इसके उलट यदि सर को गर्म पानी से धोया जाए तो बाल और आँखों को नुक्सान पहुँचता है |
- आँख और सर पर ठंडे पानी से स्नान करना चाहिए और उसके निचे के भाग पर गर्म जल से स्नान करना चाहिए |
- स्नान करने से पहले सर को धोना चाहिए , बिना सर को धोये स्नान नहीं करना चाहिए वरना ऐसा करने से पाँव आदि की उष्णता और वायु ऊपर चढ़ते हैं जिससे सर में गर्मी और खुस्की चढती है जिससे कई प्रकार कि समस्याएं उत्पन्न होती हैं | कहा भी गया है कि सर ठंडा और पाँव गर्म यही स्वास्थ्य पुरुष का लक्षण है |
- अग्नि के तरह जल भी देवता हैं और देवताओं के आगे नग्न होना असभ्यता का चिन्ह है अतः शास्त्रों के अनुसार नंगा होकर स्नान नही करना चाहिए |

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